Sunday, 30 September 2012

Medicine Buddha Holistic Healing center ,Aurangabad








We are Dr Usui /Karuna Reiki Master, Pranic Healer , Lama Fera Master ( Tibetan Healing ), Mudra Healing
We carry out FREE consultation and run weekend courses for Reiki, Vipassana Meditation, etc. Our Main mode of healing is Reiki combined with Tibetan Healing. 

Problems that can be treated with Reiki - ALL Physical and Psychosomatic ailments can be treated and Reiki shows miraculous results in case of treatment of depression, phobia, chronic backache, spondylitis, treatment of hypertension, diabetes, etc. It also has a great effect in improving relationship issues. 

Facts about Reiki - 
  • Reiki is NON INVASIVE and completely safe as no internal medicine is given nor is there any touching of body involved .
  • Reiki caod distancen heal even the extreme cases of various physical and psychosomatic problems and is extremely beneficial in relationship issues. It is very effective in old cases of backache, arthritis, spondylitis, insomnia, depression, phobias, burn injuries, etc. 
  • we work on the Principle of “No profit” and Healing is FREE for the needy. We take the donation what you like to give.

The best way to experience Reiki is to try it. Which is why we offer you two ways of trying Reiki treatment for free. We provide a Distant Reiki Healing anywhere in the world in which you can receive FREE 20 minute Reiki healing sessions, everyday morning and evening. For a better feel of Reiki healing you can experience one full proximity Reiki treatment at Aurangabad at very nominal cost, with no obligation to book further treatment or courses. You could also book FREE REIKI TREATMENT  when we travel to your city or vice versa.

We are a Reiki Master and practice and teach Reiki all over India and provide solutions based on the following methods:-In our own small way, we are trying to contribute to better health and happiness by holistic healing using Reiki and other alternative therapies like Vipassana, Tibetan Healing. For ailments that need Reiki sessions extending more than a week , we recommend learning Reiki healing and doing self treatment. 

 *रेकी का इतिहास
हमारा देश आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्ना देश है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान । 2500 वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने ये विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्र' नामक किताब में इसका कुछ वर्णन है।

19वीं शताब्दी में जापान के डॉ. मिकाओ उसुई ने इस विद्या की पुनः खोज की और आज यह विद्या रेकी के रूप में पूरे विश्र्व में फैल गई है। डॉ. मिकाओ उसुई की इस चमत्कारिक खोज ने 'स्पर्श चिकित्सा' के रूप में संपूर्ण विश्व को चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की है।

रेकी सीखने के लाभ
1. यह शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक स्तरों को प्रभावित करती है।
2. शरीर की अवरुद्ध ऊर्जा को सुचारुता प्रदान करती है।
3. शरीर में व्याप्त नकारात्मक प्रवाह को दूर करती है।
4. अतीद्रिंय मानसिक शक्तियों को बढ़ाती है।
5. शरीर की रोगों से लड़ने वाली शक्ति को प्रभावी बनाती है।
6. ध्यान लगाने के लिए सहायक होती है।
7. समक्ष एवं परोक्ष उपचार करती है।
8. सजीव एवं निर्जीव सभी का उपचार करती है।
9. रोग का समूल उपचार करती है।
10. पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है।

रेकी की पात्रता
कोई भी व्यक्ति रेकी सीख सकता है। यह व्यक्ति के बौद्धिक, शैक्षणिक या आध्यात्मिक स्तर पर निर्भर नहीं है, न ही इसे सीखने के लिए उम्र का बंधन है। कोई भी व्यक्ति इसे सीख सकता है। इसे सीखने के लिए वर्षों का अभ्यास नहीं चाहिए न ही रेकी उपचारक की व्यक्तिगत स्थिति के कारण उपचार पर कोई प्रभाव पड़ता है। यह क्षमता रेकी प्रशिक्षक के द्वारा उसके प्रशिक्षार्थी में सुसंगतता (एट्यूनमेंट) के माध्यम से उपलब्ध होती है, इसके प्राप्त होते ही व्यक्ति के दोनों हाथों से ऊर्जा का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है और इस तरह वह स्वयं का तथा दूसरों का भी उपचार कर सकता है।

रेकी कैसे कार्य करती है?
यह शरीर के रोगग्रस्त भाग की दूषित ऊर्जा को हटाकर उस क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करती है। यह व्यक्ति के तरंग स्तर को बढ़ाती है। उसके प्रभा पंडल को स्वच्छ करती है जिसमें नकारात्मक विचार और रोग रहते है। इस क्रिया में यह शरीर के ऊर्जा प्रवाहों को सुचारु करने के साथ-साथ उन्हें बढ़ाती भी है। इस तरह यह रोग का उपचार करती है

SCHEDULE OF COURSES

Reiki :     ( Two days @4 hours per day or one day @ 8 hours )
           
                    First Degree                            - Rs /-  
                    Second Degree                       - Rs /- 
                    Third Degree                           - Rs - 
                    Masters Degree                       - Rs- 

My Info: Medicine Buddha Alternative Medicine Healing center ,Aurangabad
We are Dr Deepak Ghaytilak and Dr Prashant Sarkate (BAMS -Alternative Medicine)
  Dr Usui /Karuna Reiki Master, Lama Fera Master ( Tibetan Healing ),
Email:  medicineofbuddha@gmail.com
Website : medicineofbuddha@blogspot.in / https://www.facebook.com/ReikiHealingAurangabad
  Phone Numbers - +91-9657974930/9822399423 )
THIS IS A NON PROFIT ACTIVITY.
We founded the this Reiki healing center and am currently running it with a view to increasing awareness of alternative modes of healing sciences, and wean away people from being just "Pill Poppers" to Holistic approach of healing arising from Mind-Body Techniques.

We have tried to provide an all round site, that will give you all the basic information you need for treatment and researching Reiki healing, and other forms of holistic methods of alternate treatment.

COURSES :

 The fees is very nominal and course is sincerely conducted as my aim is to spread the sciences of alternate healing  and NOT to make money . By the grace of God we have everything we could possibly want. 


Bookings for large groups at concessional rates are possible based on my visit schedule in different cities. More Information by email please followed by telephone if desired.

Wednesday, 15 August 2012

विपश्यना साधना

                                   जीवन जीने की कला – विपश्यना साधना
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 सभी सुख एवं शांति चाहते हैं, क्यों कि हमारे जीवन में सही सुख एवं शांति नहीं है। हम सभी समय समय पर द्वेष, दौर्मनस्य, क्रोध, भय, ईर्ष्या आदि के कारण दुखी होते हैं। और जब हम दुखी होते हैं तब यह दुख अपने तक ही सीमित नहीं रखते। हम औरों को भी दुखी बनाते हैं। जब कोई व्यक्ति दुखी होता है तो आसपास के सारे वातावरण को अप्रसन्न बना देता है, और उसके संपर्क में आने वाले लोगों पर इसका असर होता है। सचमुच, यह जीवन जीने का उचित तरिका नहीं है।
हमें चाहिए कि हम भी शांतिपूर्वक जीवन जीएं और औरों के लिए भी शांति का ही निर्माण करें। आखिर हम सामाजिक प्राणि हैं, हमें समाज में रहना पडता हैं और समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ पारस्पारिक संबंध रखना है। ऐसी स्थिति में हम शांतिपूर्वक जीवन कैसे जी सकते हैं? कैसे हम अपने भीतर सुख एवं शांति का जीवन जीएं, और कैसे हमारे आसपास भी शांति एवं सौमनस्यता का वातावरण बनाए, ताकि समाज के अन्य लोग भी सुख एवं शांति का जीवन जी सके?
हमारे दुख को दूर करने के लिए पहले हम यह जान लें कि हम अशांत और बेचैन क्यों हो जाते हैं। गहराई से ध्यान देने पर साफ मालूम होगा कि जब हमारा मन विकारों से विकृत हो उठता है तब वह अशांत हो जाता है। हमारे मन में विकार भी हो और हम सुख एवं सौमनस्यता का अनुभव करें, यह संभव नहीं है।
ये विकार क्यों आते है, कैसे आते है? फिर गहराई से ध्यान देने पर साफ मालूम होगा कि जब कोई व्यक्ति हमारे मनचाहा व्यवहार नहीं करता उसके अथवा किसी अनचाही घटना के प्रतिक्रियास्वरूप आते हैं। अनचाही घटना घटती है और हम भीतर तणावग्रस्त हो जाते हैं। मनचाही के न होने पर, मनचाही के होने में कोई बाधा आ जाए तो हम तणावग्रस्त होते हैं। हम भीतर गांठे बांधने लगते है। जीवन भर अनचाही घटनाएं होती रहती हैं, मनाचाही कभी होती है, कभी नहीं होती है, और जीवन भर हम प्रतिक्रिया करते रहते हैं, गांठे बांधते रहते हैं। हमारा पूरा शरीर एवं मानस इतना विकारों से, इतना तणाव से भर जाता है कि हम दुखी हो जाते हैं।
इस दुख से बचने का एक उपाय यह कि जीवन में कोई अनचाही होने ही न दें, सब कुछ मनचाहा ही हों। या तो हम ऐसी शक्ति जगाए, या और कोई हमारे मददकर्ता के पास ऐसी ताकद होनी चाहिए कि अनचाही होने न दें और सारी मनचाही पूरी हो। लेकिन यह असंभव है। विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसकी सारी ईच्छाएं पूरी होती है, जिसके जीवन में मनचाही ही मनचाही होती है, और अनचाही कभीभी नहीं होती। जीवन में अनचाही होती ही है। ऐसे में प्रश्न उठता है, कैसे हम विषम परिस्थितियों के पैदा होने पर अंधप्रतिक्रिया न दें? कैसे हम तणावग्रस्त न होकर अपने मन को शांत व संतुलित रख सकें?
भारत एवं भारत के बाहर भी कई ऐसे संत पुरुष हुए जिन्होंने इस समस्या के, मानवी जीवन के दुख की समस्या के, समाधान की खोज की। उन्होंने उपाय बताया- जब कोई अनचाही के होने पर मन में क्रोध, भय अथवा कोई अन्य विकार की प्रतिक्रिया आरंभ हो तो जितना जल्द हो सके उतना जल्द अपने मन को किसी और काम में लगा दो। उदाहरण के तौर पर, उठो, एक गिलास पानी लो और पानी पीना शुरू कर दो—आपका गुस्सा बढेगा नहीं, कम हो जायेगा। अथवा गिनती गिननी शुरू कर दो—एक, दो, तीन, चार। अथवा कोई शब्द या मंत्र या जप या जिसके प्रति तुम्हारे मन में श्रद्धा है ऐसे किसी देवता का या संत पुरुष का नाम जपना शुरू कर दो। मन किसी और काम में लग जाएगा और कुछ हद तक तुम विकारों से, क्रोध से मुक्त हो जाओगे।
इससे मदद हुई। यह उपाय काम आया। आजभी काम आता है। ऐसे लगता है कि मन व्याकुलता से मुक्त हुआ। लेकिन यह उपाय केवल मानस के उपरी सतह पर ही काम करता है। वस्तुत: हमने विकारों को अंतर्मन की गहराईयों में दबा दिया, जहां उनका प्रजनन एवं संवर्धन चलता रहा। मानस के उपर शांति एवं सौमनस्यता का एक लेप लग गया लेकिन मानस की गहराईयों में दबे हुए विकारों का सुप्त ज्वालामुखी वैसा ही रहा, जो समया पाकर फूट पडेगा ही।
भीतर के सत्य की खोज करने वाले कुछ वैज्ञानिकों ने इसके आगे खोज की। अपने मन एवं शरीर के सच्चाई का भीतर अनुभव किया। उन्होंने देखा कि मन को और काम में लगाना यानी समस्या से दूर भागना है। पलायन सही उपाय नहीं है, समस्या का सामना करना चाहिए। मन में जब विकार जागेगा, तब उसे देखो, उसका सामना करो। जैसे ही आप विकार को देखना शुरू कर दोगे, वह क्षीण होता जाएगा और धीरे धीरे उसका क्षय हो जाएगा।
यह अच्छा उपाय है। दमन एवं खुली छूट की दोनो अतियों को टालता है। विकारों को अंतर्मन की गहराईयों में दबाने से उनका निर्मूलन नहीं होगा। और विकारों को अकुशल शारीरिक एवं वाचिक कर्मों द्वारा खुली छूट देना समस्याओं को और बढाना है। लेकिन अगर आप केवल देखते रहोगे, तो विकारों का क्षय हो जाएगा और आपको उससे छुटकारा मिलेगा।
कहना तो बड़ा आसान है, लेकिन करना बड़ा कठिन। अपने विकारों का सामना करना आसान नहीं है। जब क्रोध जागता है, तब इस तरह सिर पर सवार हो जाता है कि हमें पता भी नहीं चलता। क्रोध से अभिभूत होकर हम ऐसे शारीरिक एवं वाचिक काम कर जाते हैं जिससे हमारी भी हानि होती है, औरों की भी। जब क्रोध चला जाता है, तब हम रोते हैं और पछतावा करते हैं, इस या उस व्यक्ति से या भगवान से क्षमायाचना करते हैं— हमसे भूल हो गयी, हमें माफ कर दो। लेकिन जब फिर वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है तो हम वैसे ही प्रतिक्रिया करते हैं। बार-बार पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं होता।
हमारी कठिनाई यह है कि जब विकार जागता है तब हम होश खो बैठते हैं। विकार का प्रजनन मानस की तलस्पर्शी गहराईयों में होता है और जब तक वह उपरी सतह तक पहुंचता है तो इतना बलवान हो जाता है कि हमपर अभिभूत हो जाता है। हम उसको देख नहीं पाते।
तो कोई प्राईवेट सेक्रेटरी साथ रख लिया जो हमें याद दिलाये, देख मालिक, तुझ में क्रोध आ गया है, तू क्रोध को देख। क्यों कि क्रोध दिन के चौबीस घंटों में कभी भी आ सकता है इसलिए तीन प्राईवेट सेक्रेटरीज् को नौकरी में रख लूं। समझ लो, रख लिए। क्रोध आया और सेक्रेटरी कहता है, देख मालिक, क्रोध आया। तो पहला काम यह करूंगा कि उसे डांट दूंगा। मूर्ख कहीं का, मुझको सिखाता है? मैं क्रोध से इतना अभिभूत हो जाता हूं कि यह सलाह कुछ काम नहीं आती।
मान लो मुझे होश आया और मैं ने उसे नहीं डांटा। मैं कहता हूं—बड़ा अच्छा कहा तूने. अब मैं क्रोध का ही दर्शन करूंगा, उसके प्रति साक्षीभाव रखूंगा। क्या यह संभव है ? जब आंख बंद कर क्रोध देखने का प्रयास करूंगा तब जिस बात को लेकर क्रोध जागा, बार-बार वही बात, वही व्यक्ती, वह ही घटना मन में आयेगी। मैं क्रोध को नहीं, क्रोध के आलंबन को देख रहा हूं। इससे क्रोध और भी ज़ादा बढेगा। यह कोई उपाय नहीं हुआ। आलंबन को काटकर केवल विकार को देखना बिल्कुल आसान नहीं होता।
लेकिन कोई व्यक्ति परम मुक्त अवस्था तक पहुंच जाता है, तो सही उपाय बताता है। ऐसा व्यक्ति खोज निकालता है कि जब भी मन में कोई विकार जागे तो शरीर पर दो घटनाएं उसी वक्त शुरू हो जाती हैं। एक, सांस अपनी नैसर्गिक गति खो देता है। जैसे मन में विकार जागे, सांस तेज एवं अनियमित हो जाता है। यह देखना बड़ा आसान है। दोन, सूक्ष्म स्तर पर शरीर में एक जीवरासायनिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप संवेदनाओं का निर्माण होता है। हर विकार शरीर पर कोई न कोई संवेदना निर्माण करता है।
यह प्रायोगिक उपाय हुआ। एक सामान्य व्यक्ति अमूर्त विकारों को नहीं देख सकता—अमूर्त भय, अमूर्त क्रोध, अमूर्त वासना आदि। लेकिन उचित प्रशिक्षण एवं प्रयास करेगा तो आसानी से सांस एवं शरीर पर होने वाली संवेदनाओं को देख सकता है। दोनों का ही मन के विकारों से सीधा संबंध है।
सांस एवं संवेदनाएं दो तरह से मदत करेगी। एक, वे प्राईवेट सेक्रेटरी का काम करेंगी। जैसे ही मन में कोई विकार जागा, सांस अपनी स्वाभाविकता खो देगा, वह हमे बतायेगा—देख, कुछ गडबड है! और हम सांस को डांट भी नहीं सकते। हमें उसकी चेतावनी को मानना होगा। ऐसे ही संवेदनाएं हमें बतायेगी कि कुछ गलत हो रहा है। दोन, चेतावनी मिलने के बाद हम सांस एवं संवेदनाओं को देख सकते है। ऐसा करने पर शीघ्र ही हम देखेंगे कि विकार दूर होने लगा।
यह शरीर और मन का परस्पर संबंध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ मन में जागने वाले विचार एवं विकार हैं और दूसरी तरफ सांस एवं शरीर पर होने वाली संवेदनाएं हैं। मन में कोई भी विचार या विकार जागता है तो तत्क्षण सांस एवं संवेदनाओं को प्रभावित करता ही है। इस प्रकार, सांस एवं संवेदनाओं को देख कर हम विकारों को देख रहे हैं। पलायन नहीं कर रहे, विकारों के आमुख होकर सच्चाई का सामना कर रहे हैं। शीघ्र ही हम देखेंगे कि ऐसा करने पर विकारों की ताकत कम होने लगी, पहले जैसे वे हमपर अभिभूत नहीं होते। हम अभ्यास करते रहें तो उनका सर्वथा निर्मूलन हो जाएगा। विकारों से मुक्त होते होते हम सुख एवं शांति का जीवन जीने लग जाएंगे।
इस प्रकार आत्मनिरिक्षण की यह विद्या हमें भीतर और बाहर दोनो सच्चाईयों से अवगत कराती है। पहले हम केवल बहिर्मुखी रहते थे और भीतर की सच्चाई को नहीं जान पाते थे। अपने दुख का कारण हमेशा बाहर ढूंढते थे। बाहर की परिस्थितियों को कारण मानकर उन्हें बदलने का प्रयत्न करते थे। भीतर की सच्चाई के बारे में अज्ञान के कारण हम यह नहीं समझ पाते थे कि हमारे दुख का कारण भीतर है, वह है सुखद एवं दुखद संवेदनाओं के प्रति अंध प्रतिक्रिया।
अब, अभ्यास के कारण, हम सिक्के का दूसरा पहलू देख सकते हैं। हम सांस को भी जान सकते है और भीतर क्या हो रहा उसको भी। सांस हो या संवेदना, हम उसे मानसिक संतुलन खोये बिना देख सकते हैं। प्रतिक्रिया बंद होती है तो दुख का संवर्धन नहीं होता। उसके बजाय, विकार उभर कर आते हैं और उनकी निर्जरा होती है, क्षय होता है।
जैसे जैसे हम इस विद्या में पकते चले जांय, विकार शीघ्रता के साथ क्षय होने लगते हैं। धीरे धीरे मन विकारों से मुक्त होता है, शुद्ध होता है। शुद्ध चित्त हमेशा प्यार से भरा रहता है—सबके प्रति मंगल मैत्री, औरों के अभाव एवं दुखों के प्रति करुणा, औरों के यश एवं सुख के प्रति मुदिता एवं हर स्थिति में समता।
जब कोई उस अवस्था पर पहुंचता है तो पूरा जीवन बदल जाता है। शरीर एवं वाणी के स्तर पर कोई ऐसा काम कर नहीं पायेगा जिससे की औरों की सुख-शांति भंग हो। उसके बजाय, संतुलित मन शांत हो जाता है और अपने आसपास सुख-शांति का वातावरण निर्माण करता है। अन्य लोग इससे प्रभावित होते हैं, उनकी मदत होने लगती है।
जब हम भीतर अनुभव हो रही हर स्थिति में मन संतुलित रखते हैं, तब किसी भी बाह्य परिस्थिति का सामना करते हुए तटस्थ भाव बना रहता है। यह तटस्थ भाव पलायनवाद नहीं है, ना यह दुनिया की समस्याओं के प्रति उदासीनता या बेपरवाही है। विपश्यना (Vipassana) का नियमित अभ्यास करने वाले औरों के दुखों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, एवं उनके दुखों को हटाने के लिए बिना व्याकुल हुए मैत्री, करुणा एवं समता भरे चित्त के साथ हर प्रकार प्रयत्नशील होते हैं। उनमें पवित्र तटस्थता आ जाती हैं—मन का संतुलन खोये बिना कैसे पूर्ण रूप से औरों की मदत के लिए वचनबद्ध होना। इस प्रकार औरों के सुख-शांति के लिए प्रयत्नशील होकर वे स्वयं सुखी एवं शांत रहते हैं।
भगवान बुद्ध ने यही सिखाया—जीवन जीने की कला। उन्होंने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की। उन्होंने अपने शिष्यों को मिथ्या कर्म-कांड नहीं सिखाये। बल्कि, उन्होंने भीतर की नैसर्गिक सच्चाई को देखना सिखाया। हम अज्ञानवश प्रतिक्रिया करते रहते हैं, अपनी हानि करते हैं औरों की भी हानि करते हैं। जब सच्चाई को जैसी-है-वैसी देखने की प्रज्ञा जागृत होती है तो यह अंध प्रतिक्रिया का स्वभाव दूर होता है। तब हम सही क्रिया करते हैं—ऐसा काम जिसका उगम सच्चाई को देखने और समझने वाले संतुलित चित्त में होता है। ऐसा काम सकारात्मक एवं सृजनात्मक होता है, आत्महितकारी एवं परहितकारी।
आवश्यक है, खुद को जानना, जो कि हर संत पुरुष की शिक्षा है। केवल कल्पना, विचार या अनुमान के बौद्धिक स्तर पर नहीं, भावुक होकर या भक्तिभाव के कारण नहीं, जो सुना या पढा उसके प्रति अंधमान्यता के कारण नहीं। ऐसा ज्ञान किसी काम का नहीं है। हमें सच्चाई को अनुभव के स्तर पर जानना चाहिए। शरीर एवं मन के परस्पर संबंध का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए। इसी से हम दुख से मुक्ति पा सकते हैं।
अपने बारे में इस क्षण का जो सत्य है, जैसा भी है उसे ठीक वैसा ही, उसके सही स्वभाव में देखना समझना, यही विपश्यना है। भगवान बुद्ध के समय की भारत की जनभाषा में पस्सना (पश्यना / passana) कहते थे देखने को, यह जो खुली आंखों से सामान्य देखना होता है उसको। लेकिन विपस्सना (विपश्यना) का अर्थ है जो चीज जैसी है उसे वैसी उसके सही रूप में देखना, ना कि केवल जैसा उपर उपर से प्रतित होता है। भासमान सत्य के परे जाकर समग्र शरीर एवं मन के बारे में परमार्थ सत्य को जानना आवश्यक है। जब हम उस सच्चाई का अनुभव करते हैं तब हमारा अंध प्रतिक्रिया करने का स्वभाव बदल जाता है, विकारों का प्रजनन बंद होता है, और अपने आप पुराने विकारों का निर्मूलन होता है। हम दुखों से छुटकारा पाते हैं एवं सही सुख का अनुभव करने लगते हैं।
विपश्यना साधना के शिविर में दिए जाने वाले प्रशिक्षण के तीन सोपान हैं। एक, ऐसे शारीरिक एवं वाचिक कर्मों से विरत रहो, जिनसे औरों की सुख-शांति भंग होती हो। विकारों से मुक्ति पाने का अभ्यास हम नहीं कर सकते अगर दूसरी ओर हमारे शारीरिक एवं वाचिक कर्म ऐसे हैं जिससे की विकारों का संवर्धन हो रहा हो। इसलिए, शील की आचार संहिता इस अभ्यास का पहला महत्त्वपूर्ण सोपान है। जीव-हत्या, चोरी, कामसंबंधी मिथ्याचार, असत्य भाषण एवं नशे के सेवन से विरत रहना—इन शीलों का पालन निष्ठापूर्वक करने का निर्धार करते हैं। शील पालन के कारण मन कुछ हद तक शांत हो जाता है और आगे का काम करना संभव होता है।
अगला सोपान है, इस जंगली मन को एक (सांस के) आलंबन पर लगाकर वश में करना। जितना हो सके उतना समय लगातार मन को सांस पर टिकाने अभ्यास करना होता है। यह सांस की कसरत नहीं है, सांस का नियमन नहीं करते। बल्कि, नैसर्गिक सांस को देखना होता है, जैसा है वैसा, जैसे भी भीतर आ रहा हो, जैसे भी बाहर जा रहा हो। इस तरह मन और भी शांत हो जाता है और तीव्र विकारों से अभिभूत नहीं होता। साथ ही साथ, मन एकाग्र हो जाता है, तीक्ष्ण हो जाता है, प्रज्ञा के काम के लायक हो जाता है।
शील एवं मन को वश में करने के यह दो सोपान अपने आपमें आवश्यक भी हैं और लाभदायी भी। लेकिन अगर हम तिसरा कदम नहीं उठायेंगे तो विकारों का दमन मात्र हो कर रह जाएगा। यह तिसरा कदम, तिसरा सोपान है अपने बारें में सच्चाई को जानकर विकारों का निर्मूलन द्वारा मन की शुद्धता। यह विपश्यना है—संवेदना के रूप में प्रकट होने वाले सतत परिवर्तनशील मन एवं शरीर के परस्पर संबंध को सुव्यवस्थित विधि से एवं समता के साथ देखते हुए अपने बारे में सच्चाई का अनुभव करना। यह भगवान बुद्ध की शिक्षा का चरमबिंदु है—आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि।
सभी इसका अभ्यास कर सकते हैं। सभी दुखियारे हैं। इस सार्वजनीन रोग का इलाज भी सार्वजनीन होना चाहिए, सांप्रदायिक नहीं। जब कोई क्रोध से पीड़ित होता है तो वह बौद्ध क्रोध, हिंदू क्रोध या ईसाई क्रोध नहीं होता। क्रोध क्रोध है। क्रोध के कारण जो व्याकुलता आती है, उसे ईसाई, यहुदी या मुस्लिम व्याकुलता नहीं कहा जा सकता। रोग सार्वजनीन है। इलाज भी सार्वजनीन होना चाहिए।
विपश्यना ऐसा ही सार्वजनीन उपाय है। औरों की सुख-शांति भंग न करने वाले शील के पालन का कोई विरोध नहीं करेगा। मन को वश करने के अभ्यास का कोई विरोध नहीं करेगा। अपने बारें में सच्चाई जानने वाली प्रज्ञा का, जिससे कि मन के विकार दूर होते है, कोई विरोध नहीं करेगा। विपश्यना सार्वजनीन विद्या है।
भीतर की सच्चाई को देखकर सत्य को जैसा है वैसा देखना—यही अपने आपको प्रत्यक्ष अनुभव से जानना है। धीरजपूर्वक प्रयत्न करते हुए हम विकारों से मुक्ती पाते हैं। स्थूल भासमान सत्य से शुरू करके साधक शरीर एवं मन के परमसत्य तक पहुंचता है। फिर उसके भी परे, शरीर एवं मन के परे, समय एवं स्थान के परे, संस्कृत सापेक्ष जगत के परे—विकारों से पूर्ण मुक्ति का सत्य, सभी दुखों से पूर्ण मुक्ति का सत्य। उस परमसत्य को चाहे जो नाम दो, सभी के लिए वह अंतिम लक्ष्य है।
सभी उस परमसत्य का साक्षात्कार करें। सभी प्राणी दुखों से मुक्त हों। सभी प्राणी शांत हो, सुखी हो।
सबका मंगल हो।

Friday, 13 July 2012

Heart Sutra (English)

Thus did I hear at one time. The Bhagavan was dwelling on Mass of Vultures Mountain in Rajagriha together with a great community of monks and a great community of bodhisattvas. At that time, the Bhagavan was absorbed in the concentration on the categories of phenomena called "Profound Perception."

Also, at that time, the bodhisattva mahasattva arya Avalokiteshvara looked upon the very practice of the profound perfection of wisdom and beheld those five aggregates also as empty of inherent nature.

Then, through the power of Buddha, the venerable Shariputra said this to the bodhisattva mahasattva arya Avalokiteshvara: "How should any son of the lineage train who wishes to practice the activity of the profound perfection of wisdom?"

He said that and the bodhisattva mahasattva arya Avalokiteshvara said this to the venerable Sharadvatiputra. "Shariputra, any son of the lineage or daughter of the lineage who wishes to practice the activity of the profound perfection of wisdom should look upon it like this, correctly and repeatedly beholding those five aggregates also as empty of inherent nature.

"Form is empty. Emptiness is form. Emptiness is not other than form; form is also not other than emptiness. In the same way, feeling, discrimination, compositional factors, and consciousness are empty.

"Shariputra, likewise, all phenomena are emptiness; without characteristic; unproduced, unceased; stainless, not without stain; not deficient,not fulfilled.

"Shariputra, therefore, in emptiness there is no form, no feeling, no discrimination, no compositional factors, no consciousness; no eye, no ear, no nose, no tongue, no body, no mind; no visual form, no sound, no odor, no taste, no object of touch, and no phenomenon. There is no eye element and so on up to and including no mind element and no mental consciousness element. There is no ignorance, no extinction of ignorance, and so on up to and including no aging and death and no extinction of aging and death. Similarly, there is no suffering, origination, cessation, and path; there is no exalted wisdom, no attainment, and also no nonattainment.

"Shariputra, therefore, because there is no attainment, bodhisattvas rely on and dwell in the perfection of wisdom, the mind without obscuration and without fear. Having completely passed beyond error, they reach the end-point of nirvana. All the buddhas who dwell in the three times also manifestly, completely awaken to unsurpassable, perfect, complete enlightenment in reliance on the perfection of wisdom. "Therefore, the mantra of the perfection of wisdom, the mantra of great knowledge, the unsurpassed mantra, the mantra equal to the unequaled, the mantra that thoroughly pacifies all suffering, should be known as truth since it is not false. The mantra of the perfection of wisdom is declared:

TADYATHA [OM] GATE GATE PARAGATE PARASAMGATE BODHI SVAHA

"Shariputra, the bodhisattva mahasattva should train in the profound perfection of wisdom like that."

Then the Bhagavan arose from that concentration and commended the bodhisattva mahasattva arya Avalokiteshvara saying: "Well said, well said, son of the lineage, it is like that. It is like that; one should practice the profound perfection of wisdom just as you have indicated; even the tathagatas rejoice."

The Bhagavan having thus spoken, the venerable Sharadvatiputra, the bodhisattva mahasattva arya Avalokiteshvara, those surrounding in their entirety along with the world of gods, humans, asuras, and gandharvas were overjoyed and highly praised that spoken by the Bhagavan.

Manjushuri - Buddha of Wisdom

Mantra to Manjushuri - Buddha of Wisdom


OM AH RAPA TSA NA DHI
(chant one mala – 108 times a day)

Chanting this mantra invokes the spiritual power and wisdom of Manjushuri – the Buddha who embodies the transcendental knowledge of all the Buddhas. Manjushuri’s holy mantra is his speech and is an expression of the wisdom realizations of all the Enlightened beings. Manjushuri’s mantras will help you make wise and good decisions. Recite this mantra daily when you are at a crossroad and to exercise good judgement.

It is excellent to recite Manjushuri’s powerful mantra faithfully each daily if you are engaged in any kind of work related to Feng Shui; Astrology, making Divinations or if you are in the teaching profession.

Shakyamuni Buddha

Mantra to Shakyamuni Buddha



TADYATHA OM MUNI MUNI
MAHA MUNI YE SOHA
(chant one mala – 108 times a day)

As you chant this mantra, visualize millions of golden light rays emanating from the Buddha’s holy body and entering your body through the crown of your head. This brings you a mountain of blessings that purifies eons of negative karma. And if you like you can also add the following mantra which causes the wisdom mind to develop.

"PRAJNA-PARAMITE YE SOHA"

What is Reiki?

A Brief Overview



Reiki is a Japanese technique for stress reduction and relaxation that also promotes healing. It is administered by "laying on hands" and is based on the idea that an unseen "life force energy" flows through us and is what causes us to be alive. If one's "life force energy" is low, then we are more likely to get sick or feel stress, and if it is high, we are more capable of being happy and healthy.

The word Reiki is made of two Japanese words - Rei which means "God's Wisdom or the Higher Power" and Ki which is "life force energy". So Reiki is actually "spiritually guided life force energy."
A treatment feels like a wonderful glowing radiance that flows through and around you. Reiki treats the whole person including body, emotions, mind and spirit creating many beneficial effects that include relaxation and feelings of peace, security and wellbeing. Many have reported miraculous results.
Reiki is a simple, natural and safe method of spiritual healing and self-improvement that everyone can use. It has been effective in helping virtually every known illness and malady and always creates a beneficial effect. It also works in conjunction with all other medical or therapeutic techniques to relieve side effects and promote recovery.
An amazingly simple technique to learn, the ability to use Reiki is not taught in the usual sense, but is transferred to the student during a Reiki class. This ability is passed on during an "attunement" given by a Reiki master and allows the student to tap into an unlimited supply of "life force energy" to improve one's health and enhance the quality of life.
Its use is not dependent on one's intellectual capacity or spiritual development and therefore is available to everyone. It has been successfully taught to thousands of people of all ages and backgrounds.
While Reiki is spiritual in nature, it is not a religion. It has no dogma, and there is nothing you must believe in order to learn and use Reiki. In fact, Reiki is not dependent on belief at all and will work whether you believe in it or not. Because Reiki comes from God, many people find that using Reiki puts them more in touch with the experience of their religion rather than having only an intellectual concept of it.
While Reiki is not a religion, it is still important to live and act in a way that promotes harmony with others. Dr. Mikao Usui, the founder of the Reiki system of natural healing, recommended that one practice certain simple ethical ideals to promote peace and harmony, which are nearly universal across all cultures.


During a meditation several years after developing Reiki, Dr. Usui decided to add the Reiki Ideals to the practice of Reiki. The Ideals came in part from the five prinicples of the Meiji emperor of Japan whom Dr. Usui admired. The Ideals were developed to add spiritual balance to Usui Reiki. Their purpose is to help people realize that healing the spirit by consciously deciding to improve oneself is a necessary part of the Reiki healing experience. In order for the Reiki healing energies to have lasting results, the client must accept responsibility for her or his healing and take an active part in it. Therefore, the Usui system of Reiki is more than the use of the Reiki energy. It must also include an active commitment to improve oneself in order for it to be a complete system. The ideals are both guidelines for living a gracious life and virtues worthy of practice for their inherent value.
The secret art of inviting happiness
The miraculous medicine of all diseases
Just for today, do not anger
Do not worry and be filled with gratitude
Devote yourself to your work. Be kind to people.
Every morning and evening, join your hands in prayer.
Pray these words to your heart
and chant these words with your mouth
Usui Reiki Treatment for the improvement of body and mind
The founder , Usui Mikao .............

 मेडीसीन बुद्धा बहुद्देशीय संस्था  , और्रंगाबाद .

नोंदणी क्रमांक :- एफ १८५१०  ( संस्था नोंदणी अधिनियम ,1860- अधिनियम 21 आणि मुंबई सार्वजनिक विश्वस्थसंस्था अधिनियम १९५०-अधिनियम मुंबई अधिनियम २९ नोंदणीकृत संस्था   )

संस्थेचे उददेश :-

1 बौद्ध धर्माचा प्रचार आणी प्रसार करणे .
2 बौद्ध भिक्षुकासंठी निवास्थान बांधणे .
3 बौद्ध धर्माच्या विपश्यना आणि इतर ध्यान आणि उपचार  हिलिंग  केंद्र उभारणे .
4 बौद्ध धर्माचे अद्यावत साहित्य ग्रंथालय उभारणे .
5 बौद्ध लेणीच्या भेटीसाठी आलेल्या पर्यटकासाठी धर्मशाळा उभारणे .
6 बौद्ध लाणीच्या दर्शनासाठी आलेल्या भाविकांसाठी व पर्यटकासाठी अन्न छात्रालय उभारणे .
7 सुसज्ज असे सुशोभीकरण गार्डन कारंजे उभारणे , लहान मुलांना खेळण्यासाठी उद्यान उभारणे .
8 बौद्ध महासभेचे आयोजन करणे .
9 बौद्ध  भिक्षुकाचे प्रवचन व धम्म प्रवाचनाचे आयोजन करणे .
10 बौद्ध धर्मासाठी व बौद्ध  लेणीच्या भेटीसाठी आलेल्या पर्यटकासाठी प्रथमोचार केंद्र उभारणे .
11  गरीब मागास विद्यार्थी / विद्यार्थीनि यांना शिक्षणासाठी मद्दत करणे .
12.गरीब व दारिद्र्य निर्मुलन करण्यासाठी योजना राबविणे .
13 एकता , बंधुता व समानता टिकविण्यासाठी प्रयत्न करणे .
14  समाजातील जातीभेद , शाखाभेद कमी व्हावा यासाठी प्रयत्न करणे.
15 बौद्ध पुराणाचे अध्ययन करण्यास युवकांना प्रोत्साहीत करणे
16 अंधश्रधा निर्मुलन करणे.
17 बौद्ध  समाजातील लोकांना एकत्रं आणून समाजाच्या विकासासाठी काम करणे .
18 नैसर्गिक आपत्तीच्या वेळी मद्दत करणे .
19 विविध  प्रकारे  आरोग्य केंद्र सुरु करणे ,दवाखाना सुरु करणे , मोफत सेवा देणे .
20 निसर्गातील समतोल राखविण्यासाठी वृक्षारोपण , रोपवाटिका , वनविकास कार्यक्रम हाती घेणे व राबविणे .
21 परिसर विकासाकरिता विविध योजना राबविणे  .
22 परिसरात रक्तदान , अन्नदान ,योगदान या  ऊपक्रमासह सांस्कृतिक कार्यक्रम क्रीडाविषयक उपक्रम राबविणे .
23गरीब समाजातील मागासलेल्या महिलांसाठी विविध योजना राबविणे।

* बौद्ध धम्माचा प्रचार आणि विकासासाठी इच्छुक  उपासकानी  खालील खात्या मदधे धम्मदान करू शकता …! 

* संस्थेचा खाते क्रं :- ५१३०२०१०००२०३२, IFSC code :- SYNB0005130 
                           सिंडीकेट बँक , कोकणवाडी शाखा स्टेशन रोड ,औरंगाबाद 

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                                            !!!!!! भवतु सब्बा मंगलम !!!!!